कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में ब्रह्माकुमारीज़ मुख्यालय माउंट आबू, राजस्थान से पधारे धार्मिक प्रभाग के राष्ट्रीय संयोजक ब्रह्माकुमार रामनाथ भाई जी उपस्थित रहे।
कार्यक्रम में तिल्दा गुरुद्वारा प्रमुख भ्राता मोहन, सिंधी समाज प्रमुख भ्राता चम्मनलाल, ब्रह्माकुमारीज़ के वरिष्ठ राजयोगी भ्राता जयेश एवं तिल्दा सेवाकेंद्र संचालिका बीके प्रियंका बहन मंचासीन रहे।
कार्यक्रम का शुभारंभ श्याम्भवी द्वारा गणेश वंदना पर दी गई सुंदर नृत्य प्रस्तुति से हुआ। इसके पश्चात अंजू सोनी बहन एवं बिंदु वर्मा बहन ने समूह गीत प्रस्तुत कर अतिथियों एवं उपस्थितजनों का स्वागत किया।
मुख्य वक्ता ब्रह्माकुमार रामनाथ भाई जी ने ‘सनातन’ शब्द का अर्थ स्पष्ट करते हुए कहा कि सनातन अर्थात जो कभी विनाश को प्राप्त न हो और सदा विद्यमान रहे। उन्होंने कहा कि सनातन संस्कृति की मूल शिक्षा यह है कि हम आत्मा हैं और शरीर आत्मा का वस्त्र है। उन्होंने आध्यात्मिक ज्ञान को गीता और रामायण की शिक्षाओं से जोड़ते हुए विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से समझाया।
उन्होंने कहा कि जब मनुष्य आत्मिक दृष्टि अपनाता है, तो उसके जीवन में प्रेम, शांति, आनंद और शक्ति जैसे गुण सहज रूप से विकसित होने लगते हैं। उन्होंने तिल्दा वासियों से सनातन संस्कृति के आध्यात्मिक मूल्यों को समझने और उन्हें अपने जीवन में अपनाने का आह्वान किया।
तिल्दा गुरुद्वारा प्रमुख भ्राता मोहन ने कहा कि गुरु-वाणी में भी आध्यात्मिक ज्ञान के महत्व को बताया गया है। आध्यात्मिक ज्ञान से कुमति दूर होती है, संतुष्टि की अनुभूति आती है तथा लोभ जैसे विकारों से मुक्ति मिलती है। समाजसेवी भ्राता हीरानंद हरिरामानी ने कविता के माध्यम से अध्यात्म के महत्व को प्रस्तुत किया।
सिंधी समाज प्रमुख भ्राता चम्मनलाल ने ब्रह्माकुमार रामनाथ भाई जी का आभार व्यक्त करते हुए उन्हें पुनः तिल्दा पधारने का निमंत्रण दिया।
विभिन्न समाजों ने किया सम्मान
कार्यक्रम के दौरान विभिन्न समाजों की ओर से ब्रह्माकुमार रामनाथ भाई जी का सम्मान किया गया। सिख समाज की ओर से मोहन भाई ने शॉल भेंट कर उनका सम्मान किया। वहीं सिंधी समाज के प्रबुद्धजनों ने रामनाथ भाई जी, जयेश भाई एवं बीके प्रियंका बहन का शॉल एवं श्रीफल भेंट कर सम्मान किया। जैन समाज की ओर से भ्राता सुदेश जैन, सौरभ जैन एवं पार्षद रानी जैन ने भी अतिथियों का सम्मान किया।
कार्यक्रम के अंत में बीके प्रियंका बहन ने राजयोग ध्यान के माध्यम से उपस्थितजनों को सनातन धर्म की आदि से वर्तमान तक की आध्यात्मिक यात्रा की अनुभूति कराई। राजयोग ध्यान के पश्चात कार्यक्रम स्थल का वातावरण शांत, सकारात्मक एवं श्रेष्ठ संस्कारों से ओतप्रोत दिखाई दिया।



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